Sunday, July 9, 2023

ग़म का दरिया

गम का दरिया धीरे धीरे
नस नस मे उतार रहा हूँ


तुमसे तो मै हारा ही था
खुद से भी अब हार रहा हूँ ।

लम्हा लम्हा वाकिफ है
उन दर्द भरे अल्फ़ाजों से

सदियों के पन्नो पर हर पल
लिखता तेरा नाम रहा हूँ ।

फ़ासलों से मेरी नाराजगी
यूं ही नहीं है बे-वजह

जब मिले साहिल पे तुम
मै खड़ा उस पार रहा हूँ ।

उलझे लोग

 कहीं भी जाऊँ गुल  दोस्ती के खिल जाते हैं  मुझे मेरे जैसे लोग  हर जगह मिल जाते हैं।  गरीबों के लिए ही बने हैं  सारे नियम कायदे  अमीरों के लि...