Wednesday, July 31, 2024

उलझे लोग

 कहीं भी जाऊँ गुल 

दोस्ती के खिल जाते हैं 

मुझे मेरे जैसे लोग 

हर जगह मिल जाते हैं। 

गरीबों के लिए ही बने हैं 

सारे नियम कायदे 

अमीरों के लिए सियासत के 

होंठ सिल जाते हैं। 

डिगते नहीं है जो 

तमाम आंधियों की चोट से

वो किसी अपने की शातिर 

फूंक से हिल जाते हैं।

कतरा कतरा रेशा रेशा 

समझ सको तो ही बेहतर है

धागों में उलझे लोगों के 

अक्सर तन छिल जाते हैं।


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