ना जाने क्यों है
पर है बेवजह अनायास
तेरी इक तस्वीर मेरे पास
जबकि मैं और तुम
कभी मिले नही हैं!
ये इत्तेफाक़ है
या कुदरत की कोई चाल है
जो मिट्टी हवा आब खुशबू
धूप चाँद रात है
पर गुल मुहब्बत के अभी तक
खिले नहीं है।
न चाहत थी , न हसरत थी , तन्हा जीने की आदत थी , तुम आए तो दुनिया बदली, हसरतों को इक मंजिल सी मिली, दिल ने चाहा तुम्हें मांग लूँ रब से, तुम ही मेरी मंजिल अगली ।
कहीं भी जाऊँ गुल दोस्ती के खिल जाते हैं मुझे मेरे जैसे लोग हर जगह मिल जाते हैं। गरीबों के लिए ही बने हैं सारे नियम कायदे अमीरों के लि...
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