क्या ये तन की चाह है
या चित्त की पुकार है
कि ख्वाब दर खयाल तुम
नजर में बस रहे हो किंतु
कण हृदय की पीर के
अश्रु में ढले नही हैं।
हाँ ये तन की चाह है
चित्त की पुकार नही
कि ख्वाब दर खयाल जल
रहा है मन सुमन किंतु
चाह के शुष्क खर
अब तलक जले नही हैं।
न चाहत थी , न हसरत थी , तन्हा जीने की आदत थी , तुम आए तो दुनिया बदली, हसरतों को इक मंजिल सी मिली, दिल ने चाहा तुम्हें मांग लूँ रब से, तुम ही मेरी मंजिल अगली ।
कहीं भी जाऊँ गुल दोस्ती के खिल जाते हैं मुझे मेरे जैसे लोग हर जगह मिल जाते हैं। गरीबों के लिए ही बने हैं सारे नियम कायदे अमीरों के लि...
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