Monday, February 4, 2019

तुम साथ थे तो सम्हल गया

मेरा वहां होना   उसे खल गया
वो बिना आग के ही जल गया

मैं तो वैसा ही रहा     जैसा था
ये तो वक़्त है   जो बदल गया

ठोकरें बहुत थी    अँधेरा भी था
तुम साथ थे इसलिए सम्हल गया

जलवाफरोश है वो शख़्स आज भी
देखा उसे और दिल मचल गया

वादों के आसमान में तारे हजार हैं
जो निभा सके वो सूरज ढल गया

शहर में चर्चा है एक खास चोट का
आइना तोड़कर पत्थर पिघल गया

महफूज है जहन में तू विनीत के
देख तेरी याद में आंसू निकल गया

देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

Tuesday, January 15, 2019

सितम गुलों का न झेला जाएगा

अभी तो ये खेल खेला जाएगा
तुम्हारे पीछे सारा मेला जाएगा

खुश है वो शख्स महफिले यार में
देखना शहर से अकेला जाएगा

मंजिल की ओर बढ़  चौकन्ना रह
दर कदम पीछे से ढकेला जाएगा

चुनता है फूल तू कांटे उखाड़कर
सितम गुलो का न झेला जाएगा

खुशबू रहेगी गर सीरत में जोर है
रंग फ़कत कोई भी उड़ेला जाएगा

           -देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

कुछ भी तो पहले जैसा नही रहा

कुछ भी तो पहले जैसा नही रहा
बदल गया तू अब वैसा नही रहा

जरूरत थी सामने बाजार भी था
मजबूर था जेब मे पैसा नही रहा

वो चला गया तो लोगों ने ये कहा
मिले तो बहुत मगर ऐसा नही रहा

विनीत याद रहा बस तेरा सुरूर
और भूल गया क्या कैसा नही रहा

          -देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Friday, June 29, 2018

यकीं तुमने मोहब्बत पर जो दिल से किया होता

कहीं कुछ भी नही है जो तुम्हारी जद के बाहर है
यकीं तुमने मोहब्बत पर जो दिल से किया होता

नजर जाती जहां तक बस दरख्तों की कतारें थी
मुझे उस दौर में मौला कैद कर रख लिया होता

जमी प्यासी गगन जलता ज़ोर कोई नही चलता
बहुत मगरूर है इंसा फिक्र कल की किया होता

जो सूखी लकड़ियां बिनने गयी एक फूल की बेटी
चमन रोया हिफाजत का खुदा जिम्मा दिया होता

यही वहशियत एक दिन जहां को खाक कर देगी
जुल्म की आग से उठते धुंए को पढ़ लिया होता

देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

Tuesday, June 19, 2018

यूँ मिला किसी अजनबी से नही

हौंसला है अगर वक़्त भी साथ है
मुश्किलें हैं बड़ी आदमी से नही

है दिया जल रहा रोशनी के लिए
कोई चाहत उसकी किसी से नही

फूल चुनकर लिए आ गई है शबा
आज कोई शिकायत जमीं से नही

तुमको ढूंढू कहाँ तुम कहाँ खो गई
कोई आवाज आती कहीं से नही

इक मुलाकात में बिखर सा गया
यूँ मिला किसी अजनबी से नही ।

           देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

इक मेरे रहने से क्या होता है

इक मेरे रहने से क्या होता है
तेरे बिन खाली मकां होता है । 

जो कह न सके हिम्मत से सच
मेरी नजर में वो बेजुबां होता है । 

जंग है जुर्म के वहशी दरिंदो से
देखें साथ में कौन खड़ा होता है । 

परिंदों का पता सुबह पूछती है
मेरे होठों पे ताला पड़ा होता है।  

सुना है शहर भी कभी गांव था
अब जिक्र नही उसका  होता है। 

तुम गए मेरा "मैं" भी चला गया
जीने का नही हौसला होता है ।   

दीवार के पार फूल भी खिले हैं
नफ़रत-ए-नजर का पर्दा होता है ।।

Saturday, August 5, 2017

दौरे-शुकूँ फिर से आज दिल जला गया

दौरे-शुकूँ फिर से आज दिल जला गया
मेरा पता पूछ कर कहीं और चला गया
आंखों का अश्कों का न दिल का कसूर था
ख़त में लिखा था जो वो ही पढ़ा गया
खुद्दार शख़्स है वो अपनी जमात का
लोगों में न जाने उसे क्या क्या कहा गया
तुम देर से आये हो तन्हा हो इसलिए
इस दर से हसरतों का मेला चला गया।
..देवेंद्र प्रताप वर्मा”विंनीत”

उलझे लोग

 कहीं भी जाऊँ गुल  दोस्ती के खिल जाते हैं  मुझे मेरे जैसे लोग  हर जगह मिल जाते हैं।  गरीबों के लिए ही बने हैं  सारे नियम कायदे  अमीरों के लि...