Wednesday, July 31, 2024

उलझे लोग

 कहीं भी जाऊँ गुल 

दोस्ती के खिल जाते हैं 

मुझे मेरे जैसे लोग 

हर जगह मिल जाते हैं। 

गरीबों के लिए ही बने हैं 

सारे नियम कायदे 

अमीरों के लिए सियासत के 

होंठ सिल जाते हैं। 

डिगते नहीं है जो 

तमाम आंधियों की चोट से

वो किसी अपने की शातिर 

फूंक से हिल जाते हैं।

कतरा कतरा रेशा रेशा 

समझ सको तो ही बेहतर है

धागों में उलझे लोगों के 

अक्सर तन छिल जाते हैं।


इत्तेफाक़

 ना जाने क्यों है

पर है बेवजह अनायास

तेरी इक तस्वीर मेरे पास

जबकि मैं और तुम

कभी मिले नही हैं!


ये इत्तेफाक़ है

या कुदरत की कोई चाल है

जो मिट्टी हवा आब खुशबू

धूप चाँद रात है

पर गुल मुहब्बत के अभी तक

खिले नहीं है।

मेहरबां हो गए

 फूल थे जो कभी बागवां हो गए

थे अकेले चले कारवां हो गए।

चंद सिक्के तिजोरी में क्या आ सजे

जाने कितनों के वो जानेजाँ हो गए।

भूल थी कुछ न बदलेगा जाने के बाद

घर कितने किराए के मकां हो गए।

साजिश है यकीनन नेमत नही कोई

पल हंसी के जो यूं मेहरबां हो गए।


तन की चाह

 क्या ये तन की चाह है  

या चित्त की पुकार है
कि ख्वाब दर खयाल तुम
नजर में बस रहे हो किंतु
कण हृदय की पीर के
अश्रु में ढले नही हैं।

हाँ ये तन की चाह है
चित्त की पुकार नही
कि ख्वाब दर खयाल जल
रहा है मन सुमन किंतु
चाह के शुष्क खर 
अब तलक जले नही हैं।

तिश्नगी

 जाने कब खत्म होगी दस्ताने तिश्नगी

जिंदगी का बोझ अब और नही उठाया जाता।

सब कुछ ठीक है कहीं कोई तकलीफ नही

ये झूठ हमसे अब और नही सुनाया जाता।

मत करो कुछ जतन भरम और बढ़ जाएगा

एक आइने को यूं आइना नही दिखाया जाता।

मैं अकेला नहीं मुझमें शामिल हैं और कई 

सोचकर जिंदगी से दामन नही छुड़ाया जाता।

'विनीत' नजरिया गलत है तरीका सही नही

साथ ऐसे जिंदगी का नही निभाया जाता।

काला और गोरा

 मन काले से घबराता है

तन गोरा ही क्यों भाता है

मन काला है या गोरा है

कुछ भेद समझ न आता है।

दोष दृष्टि मे अथवा मन में 

या कोई गूढ़ कहानी है

काले नैनों में इतराती क्यों

सपनों की गोरी रानी है।

प्रश्न पूछता जो भीतर से 

वह किसका परिचायक है

काला या गोरा क्या आखिर

कहलाने के लायक है।

तन को देखूं मन में झांकूँ 

उत्तर ना कोई मिलता है।

प्रश्न संजोये यूं ही जीवन

आगे बढ़ता चलता है।

झूठी बातें लिख दी

 अच्छी अच्छी बातें लिख दी

खुशियों की बरसातें लिख दी।

सत्ता का गुण गाने वाले को

कितनी सौगातें लिख दी।

सपनों में सूरज चमकाकर

काली लंबी रातें लिख दी।

जुगनू के पर काट छांट कर

लाचारी की लातें लिख दी।

वो दीवाना तन्हाई का है

उसके घर बारातें लिख दी।

कृषक पालते सारे जग को

हिस्से में खैरातें लिख दी।

‘विनीत’ कितना पागल है तू

कितनी झूठी बातें लिख दी।


Monday, February 19, 2024

तुम जो मिले तो

तुम जो मिले तो तुझमें ख़ुद को 

पाने की इक कोशिश की है। 

भूल गया मैं ख़ुद को जाने 

क्या पाने की ख़्वाहिश की है। 


मेरी खुशी को मैं तरसूँ 

पर तेरे ग़म में अश्रु बहाऊँ 

मनमौजी मन का पंछी 

है कैद कहाँ कुछ जान न पाऊँ। 

बुझे हुए दीपक ने फिर 

जल उठने की फरमाइश की है। 

तुम जो मिले तो तुझमें ख़ुद को 

पाने की इक कोशिश की है। 

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

एक मोड़ पर कितनी राहें

 एक मोड़ पर कितनी राहें

एक दृष्टि में दृश्य हजारों

किधर चलें और किसको देखें

किसकी ओर फैलाये बाहें।


मेरे अंतस की चाह समझ

जो दिव्य दृष्टि दे जाता है।

हर भटकन पर हाथ पकड़

वो सही राह दिखलाता है।


जीवन की अभिलाषा में जब

विचलित होकर रोता हूँ।

तब उसकी पावन अनुकंपा से

अपने सम्मुख होता हूँ।


-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

मुस्कुराहटें

मुस्कुराहटें प्रिय हैं मुझे
और उससे भी अधिक प्रिय है
मुस्कुराते हुए लोग।
जब भी ढूंढ़ने निकलता हूँ
अपनी मुस्कुराहट का स्रोत
तो कुछ मिलता नही है
मिलती हैं तो कुछ मुस्कुराहटें
कुछ अपने भीतर,
कुछ स्मृतियों में
कुछ प्रकृति में,
तो कुछ सम्मुख
प्रतिपल
प्रतिक्षण
जीवन में प्राण की तरह।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

जिंदगी की तन्हाइयों मे उदास हो रहा था

जिंदगी की तन्हाइयों मे उदास हो रहा था

मैखाने मे बैठा देवदास हो रहा था

याद आ रहे थे कुछ बीते हुए पल

जिन्होने मचाई थी जीवन मे हल-चल

कॉलेज के गेट पर एक कन्या से टकराया था

कैसे हुई मोहब्बत ये समझ न पाया था

वो रूप नगर की गोरी, मै प्रीतम नगर का छोरा

वो हुश्न की किताब थी, मै कागज था कोरा !

उसकी नजर का तीर दिल के पार हो गया

बैठे बिठाये जिंदगी से वार हो गया ।

इंतजार की रौनक क्या गुल खिला गई

मंजरे इश्क़ मे मोहब्बत की बहार छा गई।

पढ़ने के लिए यूं तो किताबें बहुत थी

पर मेरे लिए Btech का सिलेबस वही थी ।

वो थी stator और मै था rotor

उसके magnetic field मे घूमता रहा

मोहब्बत की बहार मे झूमता रहा ।

इश्क़ की खुराक को overdose कर दिया

जब जोश ही जोश मे प्रपोज कर दिया

वो बोली सूखे हुए पीपल के मुरझाए हुए पत्ते,

तुम कभी ज़िंदगी मे कुछ नहीं कर सकते ।

मोहब्बत की कैंटीन के बीमार बैक्टीरिया

अच्छा नहीं होगा अगर दोबारा ऐसी बात किया।

उस दिन के बाद उससे कोई बात न हुई

कई साल गुजर गए मुलाक़ात न हुई

इश्क़ आग का दरिया है एहसास हो गया

मै मैखाने मे बैठा देवदास हो गया ।

फिर एक दिन धूप मे बरसात हो गई

मै जिससे डर रहा था वही बात हो गई

सिविल लाइंस मे उससे मुलाक़ात हो गई

कुछ पल के लिए सही वो मेरे साथ हो गई

वो मुझे साथ लेकर अपने घर पर आई

बनाके अपने हाथों से खुद चाय पिलाई

मै उसके साथ जिंदगी के सपने सजाने लगा

दिल खामोशी मे प्यार के नगमे गाने लगा ।

….. तभी…………………

तभी एक बच्चे ने किया कमरे मे प्रवेश

उसने उसे दिया पास आने का आदेश

मै बेहोश हो गया देख कर किस्मत का हँगामा

जब उसने कहा बेटा ये हैं तुम्हारे “मामा”।

…..देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

(एक वर्षों पुराने चुट्कुले को हास्य-कविता का रूप देने की कोशिश की है)

तुम जो रूठे किनारा मिलेगा कहां

झूठ का दौर है झूठा हर ठौर है

मेरे सच को ठिकाना मिलेगा कहां

जब तलक तेरे दिल मे हूँ महफूज़ हूँ

तुम जो रूठे किनारा मिलेगा कहां।


धूप जलती रही छांव ढलती रही

मेरा सावन क्यों मुझसे रूठा रहा

पांव छाले पड़े विष के प्याले बड़े

प्यास बुझती नही दरिया सूखा रहा

तुम जो बरसे नही प्यार बनके पिया

जिंदगी को सहारा मिलेगा कहां।


मेरे घर से गायब उजाला किये

वो सरे आम कीचड़ उछाला किये

तेरी बातों पे जब से अमल कर लिया

मैंने कीचड़ में लाखों कमल कर लिया

गर उम्मीद का सिलसिला थम गया

हौसलों को इशारा मिलेगा कहाँ।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

अंजाम

 मुझे ग़म है नही कुछ भी मुझे चिंता तुम्हारी है

गुनाहों के सफर में जो जिंदगी तुमने गुजारी है।

उसे शिकवा नही कोई क़हर जिस पर तुम्हारा था

मगर मैं हमसफर हूँ जो मुझे कुछ न गंवारा था।


रूह उसकी मेरे ख्वाबो में आकर पूछती है रोज

मेरा किस्सा अधूरा होगा पूरा क्या किसी भी रोज।

उसे इंसाफ मिल जाये इबादत कर रहा हूँ मैं

दर्द न जाने कितने हर रोज सह रहा हूँ मैं।


जो है जान से प्यारा उसका काम क्या होगा

देखना है मेरे मौला कि अब अंजाम क्या होगा।


-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

छोड़कर एक दिन तुम चले जाओगे

 छोड़कर एक दिन तुम चले जाओगे

सारी रस्मे जहां की निभा जाओगे

मैं अकेला तुम्हे याद करता रहूंगा

मुझसे मिलने कभी तुम आ जाओगे।


पहले जैसा नही तुम पे अधिकार होगा

तुम जो भी कहो मुझको स्वीकार होगा

ग़म के बादल जो आये हिचकना नही

तेरी खातिर वही मेरा किरदार होगा।


तुम रहो सामने दिल यही चाहता है

जब भी चाहूं लगा लूँ गले चाहता है।

पूरी होती नही हसरतें दिल की सारी।

तू जहां भी रहे खुश रहे चाहता है।

-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

सख्त लगता है

 वो बूढ़ा है बहुत नाजुक फिर भी सख्त लगता है

पराये घर को अपनाने में काफी वक़्त लगता है।


जिसे देखो वही मेरी मोहब्बत पे नजर रखता है

लबों से मुस्कुराता दिल नजर से पस्त लगता है।


मुझे मेरी कहानी से कोई शिकवा नही लेकिन

जलाकर तू मेरे घर को बड़ा मदमस्त लगता है।


आज पैगाम क्या आया रूह ने जिस्म को तोड़ा

तेरे बेटे का है जो कल बहा है रक्त लगता है।


पहले से मुकर्रर है वक़्ते महफ़िल जमाने की

तेरा आना ही मुझे अक्सर बड़ा बेवक्त लगता है।


न वो मेरा है न होने की कोई उम्मीद है बाकी

फिर भी दिल मेरा उसके घर मे जब्त लगता है।


-देवेंद्र प्रताप वर्मा 'विनीत'

कुछ रिश्ते

वर्षों गुजर जाते हैं

कुछ रिश्ते बनाने में

मौसम बदल जाते हैं

उनके करीब आने में

किस्मत से ये रिश्ते

बन भी जाएं तो यारों

आशियाने उजड़ जाते हैं

इनको निभाने में

विश्वास के कच्चे धागों से

इनकी तकदीरें बनती हैं

सच्चे प्रेम के अमृत से

मन की तस्वीर संवरती है

ग़म छीन कर उनसे उन्हें

खुशियों की सौगात दें

तब कहीं सपनों की कलियां

हकीकत के रंग में ढलती हैं

मुश्किलें बढ़ जाती हैं

प्यार की लौ जलाने में

बर्षों गुजर जाते हैं

कुछ रिश्ते बनाने में

इस तरफ से प्यार बरसे

उस तरफ से भी करार

दोनों की धडकनों को हो

एक दूजे पे ऐतबार

रिश्तों के बाग को

वफ़ा के आंसुओं से

सींच दो

फिर जिंदगी की राह पे

मुस्कुराएगी बहार

सदियां गुजर जाती है

ऐसे रिश्ते भुलाने में

वर्षों गुजर जाते हैं

कुछ रिश्ते बनाने में।


--देवेंद्र प्रताप वर्मा"विनीत"

उलझे लोग

 कहीं भी जाऊँ गुल  दोस्ती के खिल जाते हैं  मुझे मेरे जैसे लोग  हर जगह मिल जाते हैं।  गरीबों के लिए ही बने हैं  सारे नियम कायदे  अमीरों के लि...